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मुझे नहीं पता राम वापस आए थे या नहीं। फिर भी मैं दिया जलाता हूँ।

मुझे नहीं पता भगवान राम कभी थे भी या नहीं। मुझे नहीं पता कि वो 14 साल के वनवास से वापस आए थे, और उनके स्वागत में अयोध्या के लोगों ने पूरा शहर दिये से सजा दिया था। मैंने ये दादी से सुना है, टीवी पर रामायण में देखा है। पर क्या मैं जानता हूँ? नहीं। और शायद ये ठीक भी है। क्योंकि कल रात, मैं अपने टावर की बालकनी में खड़ा था, नोएडा में 20 दूसरे टावर्स को अयोध्या की तरह जगमगाता देख रहा था, और मुझे समझ आया दिवाली कभी सिर्फ एक कहानी के बारे में थी ही नहीं। वो रात जब दुनिया रोशनी जलाती है इतिहास बताता है कि दिवाली की शुरुआत शायद किसी राजा के घर वापस आने से नहीं, बल्कि फसल के त्योहार से हुई थी। मानसून के बाद, कार्तिक महीने की सबसे अंधेरी अमावस्या की रात। अयोध्या के दिये जलने से बहुत पहले, कल्प सूत्र में दीपलिकाया का ज़िक्र है - दिये का त्योहार - जिस रात महावीर स्वामी ने पावापुरी में निर्वाण पाया था। जैन ग्रंथ रामायण से भी पुराने हैं। बौद्ध ग्रंथ कहते हैं बुद्ध के स्वर्ग से वापस आने पर दिये जलाए गए थे। और ये सिर्फ भारत की बात नहीं है। इंसान हर जगह अंधेरे से डरता आया है। ईरान में, साल की सबसे लंबी र...

देवी दोपहर 1 बजे चली जाती है: कंजक हमें हमारे बारे में क्या बताती है

कल मैंने एक सिक्योरिटी गार्ड से लड़ाई की - उसका डंडा नीचे करवाने के लिए। वो उन्हीं छोटी बच्चियों को भगा रहा था, जिन्हें एक घंटे पहले हमने देवी कहकर पूजा था।   कल महा नवमी थी । 19 अक्टूबर 2026। दिल्ली-NCR की हर सोसाइटी की तरह, हमारी सोसाइटी में भी कंजक पूजा हुई।  नौ छोटी कन्याएं। पैर धोए, टीका लगाया, कलावा बांधा, हलवा-पूरी-चना खिलाया। उनके पैर छुए। आशीर्वाद लिया, क्योंकि देवी भागवत पुराण कहता है कि इस दिन वो स्वयं दुर्गा का रूप हैं। और फिर मैंने उन्हें बाहर देखा।वही बच्चियां - ज्यादातर हमारी हाउस हेल्प की बेटियां, जिन्हें बुलाना आसान होता है क्योंकि वो मिल जाती हैं, अपनी ही फ्लोर की किसी बच्ची को बुलाने के बजाय। उनके हाथ में प्रसाद की छोटी प्लेट और 10 रुपये का सिक्का या एक प्लास्टिक का टिफिन था, गिफ्ट के तौर पर। और सिक्योरिटी गार्ड अपना काम कर रहा था। हाथ में डंडा, चिल्लाते हुए - "चलो चलो, भीड़ मत लगाओ, सोसाइटी खाली करो। "मुझे उससे बहस करनी पड़ी। भैया, डंडा नीचे रखो। प्यार से बोलो। वो अभी कन्या भोज से आई हैं। उस एक मिनट ने मेरी इस पूरी पूजा के बारे में बनी बुनियाद हिल...

एकदिवसीय स्वतंत्रता !!

एकदिवसीय स्वतंत्रता  दैनिक कार्य समाप्ति उपरान्त, अपनी पुत्री के साथ नीचे पार्क में स्वतंत्रता दिवस का पोस्टर देखा और मन अचानक स्कूल के दिनों की याद में खो गया | स्कूल के दिनों में मेरे संगीत सर एक आख़िरी बार अगले दिन के संगीत समारोह का पूर्वाभ्यास करवाते थे | मैं तबला वादक के रूप में भाग लेता था | क्या दिन थे, अपनी समझ के अनुसार केवल कार्यक्रम, मित्र, भाषण और भोजन में क्या होगा की चिंता |  कुछ मित्र भाषण प्रतियोगिता में भाग लेते थे, कभी कभी प्रशासनिक अधिकारी, नेता भी आते थे और भाषण करते थे | लगता था हम कितने आज़ाद हैं और हमारी इस आज़ादी के लिए पूर्व में कितना अथक प्रयास हुआ है | अंदर से जोश भर जाता था जब देशप्रेम के गाने बजते थे, भाषण के दौरान नारे लगाते थे, रोगंटे खड़े हो जाते थे |  मैं अकेला नहीं हूँ जिसने बचपन में यह सब महसूस किया है, हमने सबने अंतर्मन में देश प्रेम और सेवा का बोध पनपाया है कभी न कभी |  क्या आज भी वही महसूस होता है जब थोथे भाषण होते हैं, झूठे वादे, नए नए प्रपंच दिए जाते हैं | मैं बुन्देलखण्ड से आता हूँ, अब तो १५ वर्षों से राजधानी क्षेत्र में रहता हूँ...

मेरा मन्दिर

 मेरा मन्दिर  चर्चा है, या कहूँ हल्ला है, ये तो विश्वास की बात है | कैसे कह दिया, क्यूँ बहस, कैसी बहस, हमें तो चाहिए बस एक स्थान |  मेरे अधिकार की बात है, ये कैसे तुम्हारे समझने की बात है |  सनातन से था मेरा, फिर तुम्हारा, अब बस करो, दे भी दो अब जो था, है और होगा मेरा |  विवेकशून्य हूँ मैं, नहीं समझता तेरी व्यापकता |  जब मैं स्व बंधन में हूँ, कैसे छोड़ दूँ तुम्हें स्वतंत्र |  मन तो कैद नहीं कर पाया, तुम्हें अवश्य रखूँगा एक ही स्थान |  प्रतिदिन नहलाऊंगा, लेप लगाऊंगा, शंख बजाऊंगा | बस इतनी सी बात है,  ये तो विश्वास की बात है |

यूँ ही |

यूँ ही |  आज फिर लिखने को जी चाहा यूँ ही  सोचने का, देखने का, मिलने का जी चाहा यूँ ही |  कलम, दवात, पाटी, मन, चित्त और आप  यूँ ही सामंजस्य बैठा लें, एक स्थान  सजा लें |  चाहे फिर नदिया तीर हो,  या हो गृह उछीर  स्याही से, अर्थ पूर्ण शब्द सम्बन्ध बना लेते हैं यूँ ही ||  वैसे तो घर के एक कोने में निवास है आपका, बस कहने को  पट, सच ये है कि मेरा एक कोना है आपके अनंत अंतस में |  जी चाहा तो कभी आप, कभी मैं पास आयें, रूठ जायें  तो फिर ये सब आडम्बर का प्रयोजन क्यूँ ही ||  आज फिर लिखने को जी चाहा यूँ ही  सोचने का, देखने का, मिलने का जी चाहा यूँ ही | 

माँ

किसी को देखा धूप में, अपने सर का आंचल, उसे उढ़ाये, गर्म लपटों से बचाते, एक एक साल बड़ा कर रही है | आज वर्षों बाद, उसे फिर देखा, थोड़ी झुर्रियां, बाल श्वेत , आँखों की चमक और भाव वही, बार बार आंचल रखती है उसके सर पे, वो हटा देता, आज शायद उसके हाथ चल रहे थे, बोल सकता था, चल सकता था, वो बड़ा हो गया था | माँ में उम्र के आलावा कुछ नहीं बदला | "विद्या चाहिए माँ सरस्वती, वैभव चाहिए माँ लक्ष्मी, बल चाहिए माँ दुर्गा, ये सब चाहिए, अपनी माँ || "

स्वप्न की पूर्णता

कोई तो एक स्वप्न होगा, जो खुली पलकों देखा होगा । कोई तो एक महोत्सव होगा, जो स्वप्न की पूर्णता लिए होगा। कल्पना के शिखर पर मदहोश, गुम हैं, ज्वार से उत्तेजक स्वर हैं, फिर भी, इस अंतर्मन में कुछ तो नम है । इस नम्रता के  मर्म  में, कोई तो एक पुंज होगा। कोई तो एक अर्थ होगा,  कोई  तो एक रंग होगा, कोई  तो एक धर्म होगा, कोई तो एक कर्म  होगा, जो स्वप्न की पूर्णता लिए होगा। अब ये रात भी दिवा सी लगने लगी, कोई तो एक किरण होगी, जो सुबह से चली होगी, प्रकाश से परिपूर्ण होगी। उसी एक किरण में, कहीं तो आरम्भ होगा, जो स्वप्न की पूर्णता लिए होगा।